"प्रिवी कौंसिल में अपील दाखिल कराने का एक विशेष अर्थ यह भी था कि मैं कुछ समय तक फांसी की तारीख टलवा कर यह परीक्षा करना चाहता था कि नवयुवकों में कितना दम है और देशवासी कितनी सहायता दे सकते हैं । इससे मुझे बड़ी निराशाजनक सफलता हुई । अन्त में मैंने निश्चय किया था कि यदि हो सके तो जेल से निकल भागूं । ऐसा हो जाने से सरकार को अन्य तीन फांसी वालों की सजा माफ कर देनी पड़ेगी और यदि न करते तो मैं करा लेता । मैंने जेल से भागने के अनेकों प्रयत्न किये, किन्तु बाहर से कोई सहायता न मिल सकी । यहीं तो हृदय को आघात लगता है कि जिस देश में मैंने इतना बड़ा क्रान्तिकारी आन्दोलन तथा षड्यन्त्रकारी दल खड़ा किया था, वहां से मुझे प्राण-रक्षा के लिए एक रिवाल्वर तक न मिल सका ! एक नवयुवक भी सहायता को न आ सका ! अन्त में फांसी पा रहा हूं।"
— रामप्रसाद बिस्मिल, गोरखपुर जेल, 16 दिसम्बर 1927
अलविदा दोस्तों,
मेरी राष्ट्रवादिता पर प्रश्न-चिन्ह लगाने वालो के अपशब्दों और अपने ही साथियों द्वारा मूक दर्शक बने रहने से 'दुखित' होकर मैं कुछ समय के लिए(?)जा रहा हूँ.. इस 'कुछ समय' की अवधि कितनी होगी मैं भी नही जानता.??
मैं चाहूँगा कि माँ भारती को आप जैसे लोगो की कभी जरुरत ना पड़े... और आप लोग हमेशा खुश रहे और एक ही जगह पर रहे...
वन्दे मातरम्..
जय हिंद.. जय भारत...
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