Saturday, December 31, 2011

दोस्तो हमारा राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा है और राष्ट्रिय पंछी मोर है,इसके अलावा जो राष्ट्रीय चिन्ह है उसकी जानकारी निम्न प्रकार है


दोस्तो हमारा राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा है और राष्ट्रिय पंछी मोर है,इसके अलावा जो राष्ट्रीय चिन्ह है उसकी जानकारी निम्न प्रकार है......
राष्ट्रीय रोबोट…मनमोहन सिंह!
राष्ट्रीय गेम चेंजर…राहुल गांधी!
राष्ट्रीय समस्या…मनीष तिवारी!
राष्ट्रीय छिछोरा…एनडी तिवारी!
राष्ट्रीय सेल्समैन…एसआरके!
राष्ट्रीय संदेशवाहक…बरखा दत्त!
राष्ट्रीय रहस्य…सोनिया गांधी!
राष्ट्रीय नतमस्तक केंद्र…दस जनपथ!
राष्ट्रीय खुजली…महेश भट्ट!
राष्ट्रीय बाम…झंडू!
राष्ट्रीय चुगलखोर…स्वामी अग्निवेश!
राष्ट्रीय स्ट्रगलर…अभिषेक बच्चन!
राष्ट्रीय दामाद… कसाब, अफज़ल गुरू और रॉबर्ट वढेरा के बीच टाई!
राष्ट्रीय कोयल…मीरा कुमार!
राष्ट्रीय पुरुष…अर्चना पूरन सिंह!
राष्ट्रीय महिला…करण जौहर!
राष्ट्रीय गहनों की दुकान…बप्पी लहरी!
राष्ट्रीय ‘बाल’ कलाकार…अनिल कपूर!
राष्ट्रीय नायिका…नरगिस फाकरी!
राष्ट्रीय गायिका…डॉली बिंद्रा!
राष्ट्रीय गर्लफ्रेंड…दीपिका पादुकोण!
राष्ट्रीय रईसज़ादा..सिद्धार्थ माल्या!
राष्ट्रीय बकता…नवजोत सिंह सिद्धू!
राष्ट्रीय गधा…दिग्विजय सिंह!
राष्ट्रीय कुत्ता …कपिल सिब्बल!
राष्ट्रीय मसखरा… लालू यादव!
राष्ट्रीय इंतज़ार…सचिन का सौंवा शतक!
राष्ट्रीय दहशत…रा वन का सीक्वल!
राष्ट्रीय गाली…आम आदमी!
राष्ट्रीय शर्म…अरूंधति राय!
राष्ट्रीय कुकर्म…शक्ति कपूर!
राष्ट्रीय ख्वाहिश…सनी लिओन!
राष्ट्रीय हाथ…सनी देओल!
राष्ट्रीय चिंता…सलमान की शादी!
राष्ट्रीय चांटा प्रदायकर्ता- हरविंदर सिंह!
राष्ट्रीय शिशु…पार्थिव पटेल!
राष्ट्रीय ‘मैं होशियार’…अरिंदम चौधरी!
राष्ट्रीय गिरगिट… अजित सिंह!
राष्ट्रीय टेडीबीयर…नितिन गडकरी!
राष्ट्रीय रथ यात्री…लालकृष्ण आडवाणी!
राष्ट्रीय आलराउंडर…अजित अगरकर!
राष्ट्रीय असंतुष्ट..मेधा पाटकर!
राष्ट्रीय भुलक्कड़…एसएम कृष्णा!
राष्ट्रीय अतिथि…हिना रब्बानी!
राष्ट्रीय स्कूल…लवली पब्लिक स्कूल!
राष्ट्रीय ढीठ…राजा चौधरी!
राष्ट्रीय पागलखाना…बिग बॉस का घऱ!
राष्ट्रीय हंसी…राहुल महाजन!
राष्ट्रीय जासूस…दया!
राष्ट्रीय भोजन – कसम!
राष्ट्रीय टाइम पास…मूंगफली!
राष्ट्रीय पक्षी…ट्विटर!
राष्ट्रीय फिल्म..राम गोपाल वर्मा की आग!
राष्ट्रीय मैगज़ीन..मनोहर कहानियां!
राष्ट्रीय किसान – अमिताभ बच्चन!
राष्ट्रीय हाथ…हरविंदर सिंह!
राष्ट्रीय गाल…शरद पवार!
राष्ट्रीय एक्सप्रेशन..LOL!
राष्ट्रीय फ्रॉड…कंडीशन्स अप्लाई*!
राष्ट्रीय दवा – संधि सुधा!
राष्ट्रीय आईटी एक्सपर्ट…विश्वबंधु गुप्ता!
राष्ट्रीय बहन-मायावती!
राष्ट्रीय मां-बहन…राखी सावंत!

अगर कोई बाकी रह गया हो तो कृपया बताईयेँ!

Desh Premi said...

दोस्तों, कृपया 1 मिनट का समय देकर इसे पढ़ें. अगर आपको लगता है कि बात में सच्चाई है तो यह सन्देश दूसरों को भी फॉरवर्ड करें

दोस्तों, कृपया 1 मिनट का समय देकर इसे पढ़ें. अगर आपको लगता है कि बात में सच्चाई है तो यह सन्देश दूसरों को भी फॉरवर्ड करें .

अन्ना, स्वामी रामदेव या अन्य जो भ्रष्टाचार के विरूद्ध लड रहे है उनसे कांग्रेस क्यों परेशान है, जानिए कारण:

1- सरकार हर साल लोगों से 134 प्रकार के टैक्स से कितना पैसा जमा कराती है और ये पैसे कहा खर्च हो जाते है?
...
2-मंदिरों का पैसा सरकार किस मद में खर्च कराती है जिसे सिर्फ हिन्दू दान देकर इकठ्ठा करता है, ये बहुत बड़ा प्रश्न है.

3- काले धन का इतिहास क्या है, पहले कपिल सिब्बल ने कहा कोई भी नुकसान २ जी घोटाले में नहीं हुआ है, फिर अहलुवालिया ने कहा की हा वास्तव में कोई घोटाला नहीं हुआ है, फिर मनमोहन ने कहा इसकी जाँच चल रही है, विपक्ष को टालते रहे, राजा जैसा आदमी जिसके पास अपनी मोबाइल को टाप अप करने का पैसा नहीं हो, यदि वह अपनी पत्नी के नाम 3000 करोड़ रुपया मारीशाश में जमा कर दे, क्या यह सब बिना सोनिया की जानकारी के कर सकता है, उस पार्टी में जहा पर बिना सोनिया के पूछे कोई वक्तव्य तथाकथित प्रवक्ता नहीं दे सकते है,

4- फिर आया महा घोटाला देवास-इसरो डील का जिसमे की 205000 करोड़ की बैंड विड्थ को मात्र 1200 करोड़ के 10 साल के उधार के पैसे में दे दिया गया, भला हो सुब्रमनियम स्वामी जी का जिन्हें इन चोरो को नंगा कर दिया, हमारी कांग्रेसी और विदेशी मिडिया सुब्रमनियम स्वामी की तस्वीर हमेशा से गलत पेश किया है जब की वास्तव में भारत देश को ऐसे ही इमानदार नेताओ की जरुरत है जिसने कभी भी चोरी के बारे में सोचा ही नहीं,

5- फिर आया कामनवेल्थ खेल का 90000 करोड़ का घोटाला, फिर कोयला का घोटाला जिसमे ठेकेदारों द्वारा 10 पैसे प्रति किलो के भाव से कोयला खरीदा जाता है और उसे बाजार में 4 रुपये किलो तक बेचा जाता है, यह रकम अब तक 26 लाख करोड़ होती है,

6- इटली के 8 बैंक और स्वीटजरलैंड के 4 बैंको को 2005 में भारत में क्यों खोला गया है और इसमे किसका पैसा जमा होता है, ये बैंक किसको लोन देते है और इनका ब्याज क्या है, इनकी जरुरत क्यों आ पड़ी भारत में जब की भारत के ही बैंकरों की बैंक खोलने की अर्जियाँ सरकार के पास धूल खा रही है, इन बैंको को चोरी छुपे क्यों खोला गया है, इन बैंको आवश्यकता क्यों है जब भारत में 80% लोग 20 रूपया प्रतिदिन से भी कम कमाते है.

7-भारत के किसानो से कमीशन लेने वाले चोर कत्रोची के बेटे को अंदमान दीप समूह में तेल की खुदाई का ठेका क्यों दिया गया 2005 में, किसने दिया ठेका, किसके कहने पर दिया ठेका, क्या वहा पर पहले से ही तेल के कुऊ का पता लगाकर वह स्थान इसे दे दिया गया जैसे की बहुत बार खबरों में अन्य संदर्भो में आती है, यह खबर क्यों छुपाई गयी अब तक, इसे देश को क्यों नहीं बताया गया, मिडिया क्यों इसे छुपा गई, और विपक्ष ने इसे मुद्दा क्यों नहीं बनाया.

8- सरकार ने पहले कहा की बाबा बकवास कर रहे है, काला धन नाम की कोई चीज नहीं है, फिर खबर आयी की काला धन है और सबसे ज्यादा भारतीयों का है, यह स्विस बैंको के आलावा 70 और दुसरे देसों में जमा है,

9- सरकार ने कहा की टैक्स चोरी का मामला है, हम उन देशो से समझौते कर रहे है, जिससे की दोहरा कर न देना पड़े, यह टैक्स चोरी नहीं भारत देशको लूट डालने का मामला है

10- फिर बात आई की यदि ये भ्रष्टाचारी और लुटेरे इसमे से 15% टैक्स सरकार को दे तो इसे भारत के बैंको में जमा करने दिया जायेगा और किसी को यह हक़ नहीं होगा की वह पूछे की या इतना पैसा कैसे कमाया या लूटा. सरकार इस पर एक कानून क्यो नही ला रही है, किसको बचाया जा रहा है?

11- यूरिया घोटाला है और यूरिया किसान को दुगुने दाम बेचा जाता है, फिर गेहू सस्ते में खरीदा जाता है, हम अभी तक सुरक्षित अन्न भण्डारण की व्यवस्था क्यों नहीं बना पाए जब की हमारे पास धन की कमी ही नहीं है, क्योकि अन्न को सडा दिखाकर उसे कौड़ियो के भाव शराब माफिया को बचा जाता है जब की गरीब अन्न बिना मर रहा है।

12-हमारे देश में क्यों अनुसन्धान के लिए पर्याप्त पैसा नहीं दिया जाता है, यह कीसकी चाल है, जिसकी वजह से हम 5-10 गुना दाम में विदेशी चीजे खरीदते है, क्या कारण है की हमारे देश में एक भी सोलर ऊर्जा वैज्ञानिक नहीं है और दुनिया भर के परमाणु वैज्ञानिक है जो हमें हमेशा झूठा अश्वाव्हन देते है की यह परमाणु बिजली सस्ती और निरापद है भारत की परमाणु से सम्बंधित कुल बाजार 750 लाख करोड़ का होगा. जब की हम भारत में 400000 मेगावाट सोलर बिजली बना सकते है,

13-ऐसे कौन से कारण है जिनके कारन हम नेहरू के द्वारा ट्रांसफर अफ पॉवर अग्रीमेंट 14 अगस्त 1947 को दस्तखत करने के बाद भी आज तक विक्सित नहीं बन पाए, जब की हमारी जनता हफ्ते में 90 घंटा काम करती है जबकि कामचोर अंग्रेज हफ्ते में सिर्फ 30 घंटा काम करते है,

14-क्या कारण है की हमारे 5೦ रुपये में 1 डालर और 90 रुपये में 1 पौंड मिलाता है, जब की 1947 में 1 रुपये में 1 डालर मिलता था.

15- मीडिया को निष्पक्ष बनाने के लिए सरकार क्या कदम उठा रही है, मिडिया , टीवी और पत्रिकाए सरकार को बिक जाती है और निराधार और झूठ को भी सच बताकर प्रस्तुत करती है।

16- अगर देश में 2 लाख करोड़ रुपये की नकदी सर्कुलेशन में है तो देश की अर्थव्यवस्था करीब 100 लाख करोड़ रुपयों की होती है. और हमारे देश में रिजर्व बैंक अबतक लगभग 18 लाख करोड़ रुपयों के नोट छाप चुका है और कमसे कम 10 लाख करोड़ रुपये सर्कुलेशन में है. इस हिसाब से देश की अर्थव्यवस्था करीब 400 से 500 लाख करोड़ रुपये होनी चाहिए लेकिन अभी हमारी अर्थव्यवस्था केवल 60 लाख करोड़ की है. जबकि इतनी अर्थव्यवस्था के लिए दो लाख करोड़ से भी कम सर्कुलेशन मनी की जरूरत है.

17- अगर 400 लाख करोड़ रूपये का काला धन देश में वापिस आ जाता है तो देश की अर्थव्यवस्था करीब 20,000 लाख करोड़ रुपये होगी ... क्या आप जानते हैं कि इस समय अमेरिका सबसे शक्तिशाली देश है और उसकी अर्थव्यवस्था करीब 650 लाख करोड़ की है... मतलब 400 लाख करोड़ रुपये वापिस मिलने पर हम अमरीका से भी 30 गुना ज्यादा शक्तिशाली बन सकते है

Friday, December 23, 2011

23 मार्च 1931 को शहीद-ए-आजम भगतसिंह को फांसी के तख्ते पर ले जाने वाला पहला

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2 अक्तूबार धोखा है छलना है, 23 जनवरी की भी कहीं कोई तुलना है? ??






नेताजी निष्कलंक और पवित्र,
गांधीजी लांछनों से परिपूर्ण और विचित्र।
...
... नेताजी निर्मल हृदय और उदार,
गांधीजी ईर्ष्यालु और अनुदार।

नेताजी निर्भय और निर्भीक,
गांधीजी कायरता प्रतीक।

नेताजी ने गांधीजी को कभी अस्वीकार नहीं किया,
गांधीजी ने किसी क्रांतिकारी को कभी स्वीकार नहीं किया।

नेताजी का अर्थ है देशभक्ति और क्रांति,
गांधीजी का अर्थ है कनफ्यूजन और भ्रांति।

नेताजी सभी स्तरों पर स्पष्ट हैं,
गांधीजी स्वयं संशयग्रस्थ हैं।

नेताजी का जीवन निरंतर संघर्ष,
गांधीजी के लिए पलायन ही आदर्श।

नेताजी टूट गए पर झुके नहीं,
गांधीजी किसी चुनौती के सामने कभी टिके नहीं।

नेताजी की वीरता से भारत छोड़ गए अंग्रेज़,
गांधीजी की कायरता से देश को तोड़ गए अंग्रेज़।

नेताजी की देन है गौरव और स्वाभिमान,
गांधीजी की देन है नेहरू और पाकिस्तान।

2 अक्तूबार धोखा है छलना है,
23 जनवरी की भी कहीं कोई तुलना है? ??

नेताजी की भावना उत्तरोत्तर प्रचंड हो,
नेताजी की भारत माता फिर से अखंड हो।

आचार्य धर्मेंद्र जी महाराज

Wednesday, December 21, 2011

अन्‍ना, उनकी टीम और हिटलर में काफी समानताएं हैं. यह महज एक इत्‍तेफाक भी हो सकता है. दोनों के बीच समानताओं पर गौर कीजिए-






गांधी और एडोल्‍फ हिटलर में बेशक कोई समानता नहीं थी, लेकिन गांधीवादी अन्‍ना  हजार व हिटलर में कई समानताएं हैं. पढ़ने में यह अटपटा लग सकता है, ले‍किन शोध के बाद जो तथ्‍य सामने आए हैं, उससे साफ पता चलता है कि अन्‍ना, उनकी टीम और हिटलर में काफी समानताएं हैं. यह महज एक इत्‍तेफाक भी हो सकता है. दोनों के बीच समानताओं पर गौर कीजिए-

हिटलर के पिता के सात बच्‍चे थे, अन्‍ना के पिता के भी सात बच्‍चे थ...े.
हिटलर 7वीं क्‍लास तक पढ़ा था, अन्‍ना भी 7वीं क्‍लास तक पढ़े हैं.
शारीरिक कमी के बावजूद हिटलर फौज में था, शारीरिक कमी के बावजूद अन्‍ना भी फौज में थे.
हिटलर फौज में इमरजेंसी में भर्ती हुआ था, अन्‍ना भी फौज में 1962 में युद्ध के दौरान पैदा हुई इमरजेंसी जैसे हालात में भर्ती हुए थे.
हिटलर के सभी साथी हमले में मारे गए थे, अन्‍ना के भी सभी साथी एक हमले में मारे गए थे, सिर्फ अन्‍ना बचे.
हिटलर विवाहित नहीं था, अन्‍ना ने भी विवाह नहीं किया है.
हिटलर के मन में जर्मन संसद के लिए कोई आदर नहीं था, यही हाल अन्‍ना का भी है.
हिटलर जनता को संसद से ऊपर मानता था, अन्‍ना भी जनता को संसद से ऊपर मानते हैं.
हिटलर का मानना था कि प्रभावी प्रचार करके किसी भी झूठ को सच साबित किया जा सकता है, अन्‍ना व उनकी व उनकी टीम भी जनलोकपाल को हर ताले की चाबी बता प्रभावी प्रचार कर रही है.
हिटलर जनमत संग्रह का पक्षधर था, उसने जर्मनी में चार बार जनमत संग्रह करवाया था, अन्‍ना भी जनमत संग्रह के पक्षधर हैं, वे भी कई जगह जनमत संग्रह करवा चुके हैं.
हिटलर जनमत संग्रह का इस्‍तेमाल वहां के संसद के खिलाफ किया था, अन्‍ना भी जनमत संग्रह का इस्‍तेमाल देश की संसदीय व्‍यवस्‍था के खिलाफ कर रहे हैं.

जय हिंद जय भारत 

मित्रो समय ठीक नहीं है देश और धर्म को बचाना है

इस्लामी आतंकवाद से लड़ा था. हम उस गुरुगोबिंद सिंह और सावरकर कि औलाद है



भाई, सभी संघियो, भारतप्रेमिओ, राष्ट्रप्रेमियो, राष्ट्रवादियो, इस मिटटी के
वीरो से एक बात कहेना चाहता हूँ कि एक झूट को एक लाख बार भी बोला जाये तो वो सच

नहीं हो जाता है. आप किसी दिग्भर्मित सिंह या किसी राहुल या सोनिया गाँधी से न डरे
और न ही झुके. क्यूंकि तुम्हारे बाप दादा भी नहीं झुके थे, जिनके बाप दादा घास कि
रोटिया खाकर और राणा सांघा जैसे लोग जिसके शारीर पर एक हजार जखम थे भी अंत तक

इस्लामी आतंकवाद से लड़ा था. हम उस गुरुगोबिंद सिंह और सावरकर कि औलाद है जिसने
वीरता कि नई गाथाये लिखी थी, हमारा आज का पंजाब जो इस्लामी आतंकवाद के १००० हमले खा
कर भी देश का सबसे संपन राज्ये है कि वीर भूमि के सपूत है. हम उस उन्नी कृष्णन के

भाई है जो केरला में पैदा हुआ, बेंगलोर में पढ़ा, बिहार रेजिमेंट में भर्ती होकर
कश्मीर कि सर्द हवाओ में देश के दुश्मन से टक्कर ली और महाराष्ट्र कि पवित्र भूमि
पर देश के अतंकवादियो से लड़ते वीरगति को प्राप्त हुआ. तो मेरे मित्र श्री

दिग्भर्मित सिंह जी आपकी त्रिमूर्ति को मेरे देश का बच्चा सबक सिखाने का जज्बा और
हौंसला रखता है. इस देश के लोग सो रहे है मरे नहीं है, और टुनिशिया - मिश्र कि जनता
से भी गए गुजरे नहीं जो अपनी सत्ता के नशे में अहंकारी और रक्षाशी अट्टहास से देश

कि जनता के ऊपर बैठे लोगो को सबक न सिखा सके. क्रांति मूर्त रूप ले रही है यह
घोटाले और भ्रष्टाचार का नंगा नाच उसपर महंगाई हर पेट को क्रांति कि जमी तैयार कर
रही है. राम के वनवास जाने से चाहए कितने रावन मारे गए परन्तु हिन्दू ने मन्थरा और

केकई को आज भी नहीं बक्शा है.
जय भारत जय

गांधी की परिभाषा में किसी को फांसी देना हिंसा नहीं थी

23 मार्च 1931 को शहीद-ए-आजम भगतसिंह को फांसी के तख्ते पर ले जाने वाला पहला जिम्मेवार सोहनलाल वोहरा हिन्दू की गवाही थी । यही गवाह बाद में इंग्लैण्ड भाग गया और वहीं पर मरा । शहीदे आजम भगतसिंह को फांसी दिए जाने पर अहिंसा के महान पुजारी गांधी ने कहा था, ‘‘हमें ब्रिटेन के विनाश के बदले अपनी आजादी नहीं चाहिए ।’’ और आगे कहा, ‘‘भगतसिंह की पूजा से देश को बहुत हानि हुई और हो रही है । वहीं इसका परिणाम गुंडागर्दी का पतन है । फांसी शीघ्र दे दी जाए ताकि 30 मार्च से करांची में होने वाले कांग्रेस अधिवेशन में कोई बाधा न आवे ।” अर्थात् गांधी की परिभाषा में किसी को फांसी देना हिंसा नहीं थी । इसी प्रकार एक ओर महान् क्रान्तिकारी जतिनदास को जो आगरा में अंग्रेजों ने शहीद किया तो गांधी आगरा में ही थे और जब गांधी को उनके पार्थिक शरीर पर माला चढ़ाने को कहा गया तो उन्होंने साफ इनकार कर दिया अर्थात् उस नौजवान द्वारा खुद को देश के लिए कुर्बान करने पर भी गांधी के दिल में किसी प्रकार की दया और सहानुभूति नहीं उपजी, ऐसे थे हमारे अहिंसावादी गांधी । जब सन् 1937 में कांग्रेस अध्यक्ष के लिए नेताजी सुभाष और गांधी द्वारा मनोनीत सीताभिरमैया के मध्य मुकाबला हुआ तो गांधी ने कहा यदि रमैया चुनाव हार गया तो वे राजनीति छोड़ देंगे लेकिन उन्होंने अपने मरने तक राजनीति नहीं छोड़ी जबकि रमैया चुनाव हार गए थे। इसी प्रकार गांधी ने कहा था, “पाकिस्तान उनकी लाश पर बनेगा” लेकिन पाकिस्तान उनके समर्थन से ही बना । ऐसे थे हमारे सत्यवादी गांधी । इससे भी बढ़कर गांधी और कांग्रेस ने दूसरे विश्वयुद्ध में अंग्रेजों का समर्थन किया तो फिर क्या लड़ाई में हिंसा थी या लड्डू बंट रहे थे ? पाठक स्वयं बतलाएं ? गांधी ने अपने जीवन में तीन आन्दोलन (सत्याग्रहद्) चलाए और तीनों को ही बीच में वापिस ले लिया गया फिर भी लोग कहते हैं कि आजादी गांधी ने दिलवाई ।इससे भी बढ़कर जब देश के महान सपूत उधमसिंह ने इंग्लैण्ड में माईकल डायर को मारा तो गांधी ने उन्हें पागल कहा इसलिए नीरद चौ० ने गांधी को दुनियां का सबसे बड़ा सफल पाखण्डी लिखा है । इस आजादी के बारे में इतिहासकार सी. आर. मजूमदार लिखते हैं – “भारत की आजादी का सेहरा गांधी के सिर बांधना सच्चाई से मजाक होगा । यह कहना उसने सत्याग्रह व चरखे से आजादी दिलाई बहुत बड़ी मूर्खता होगी । इसलिए गांधी को आजादी का ‘हीरो’ कहना उन सभी क्रान्तिकारियों का अपमान है जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना खून बहाया ।” यदि चरखों की आजादी की रक्षा सम्भव होती है तो बार्डर पर टैंकों की जगह चरखे क्यों नहीं रखवा दिए जाते ?

जय हिंद जय भारत

Thursday, December 15, 2011

वीरो की भूमि को क्या हो गया


वीरो की भूमि को क्या हो गया
विदेशियों के सामने झुकने को मजबूर हो गया
दो कौड़ी के देश से शांति मांगता है
आत्म सम्मान से कितना दूर हो गया

सोने की चिड़िया बिक गयी बेमोल
चिन्दिचोर ले गये खजाने खोल खोल
बिना जीभ वाले कह रहे बोलो तोल तोल
जगदगुरु को सिखा रहे बढाओ मेल जोल

बापू के देश को शांति रखना बता रहे
वीर अशोक की धरती को रोज ललकार रहे
राम की पवन भूमि को मर्यादा का पाठ पढ़ा रहे
बुद्ध के प्यारे बेटो को त्यागी बनकर दिखा रहे

सब धर्म समेटे भारत को सांप्रदायिक देश बना रहे
नंग धडंग सभ्यता अपनाकर आखों का पानी मार रहे
परिवार समाज अपनत्व के संस्कारो को भुला रहे
थी विश्व पटल पर जो, उस पहचान को मिटा रहे

क्या हुआ यहाँ, देश की संस्कृति को भुला दिया
अंतिम साँस तक लड़ने वालों को हथियार डालना सिखा दिया
लज्जाशून्य हैं जो इतिहास नही देख पाए
हमने और सिर्फ हमने भारत माँ का सर झुका दिया

Saturday, December 10, 2011

रामप्रसाद बिस्मिल, गोरखपुर जेल, 16 दिसम्बर 1927

"प्रिवी कौंसिल में अपील दाखिल कराने का एक विशेष अर्थ यह भी था कि मैं कुछ समय तक फांसी की तारीख टलवा कर यह परीक्षा करना चाहता था कि नवयुवकों में कितना दम है और देशवासी कितनी सहायता दे सकते हैं । इससे मुझे बड़ी निराशाजनक सफलता हुई । अन्त में मैंने निश्चय किया था कि यदि हो सके तो जेल से निकल भागूं । ऐसा हो जाने से सरकार को अन्य तीन फांसी वालों की सजा माफ कर देनी पड़ेगी और यदि न करते तो मैं करा लेता । मैंने जेल से भागने के अनेकों प्रयत्‍न किये, किन्तु बाहर से कोई सहायता न मिल सकी । यहीं तो हृदय को आघात लगता है कि जिस देश में मैंने इतना बड़ा क्रान्तिकारी आन्दोलन तथा षड्यन्त्रकारी दल खड़ा किया था, वहां से मुझे प्राण-रक्षा के लिए एक रिवाल्वर तक न मिल सका ! एक नवयुवक भी सहायता को न आ सका ! अन्त में फांसी पा रहा हूं।"

रामप्रसाद बिस्मिल, गोरखपुर जेल, 16 दिसम्बर 1927


अलविदा दोस्तों,
मेरी राष्ट्रवादिता पर प्रश्न-चिन्ह लगाने वालो के अपशब्दों और अपने ही साथियों द्वारा मूक दर्शक बने रहने से 'दुखित' होकर मैं कुछ समय के लिए(?)जा रहा हूँ.. इस 'कुछ समय' की अवधि कितनी होगी मैं भी नही जानता.??
मैं चाहूँगा कि माँ भारती को आप जैसे लोगो की कभी जरुरत ना पड़े... और आप लोग हमेशा खुश रहे और एक ही जगह पर रहे...
वन्दे मातरम्..
जय हिंद.. जय भारत...

Tuesday, December 6, 2011

शहीद-ए-आज़म अमर शहीद सरदार भगतसिंह (२८ सितंबर १९०७ - २३ मार्च १९३१)


शहीद-ए-आज़म अमर शहीद सरदार भगतसिंह (२८ सितंबर १९०७ - २३ मार्च १९३१)


जिंदगी तो अपने दम पर ही जी जाती है... दूसरों के कंधों पर तो सिर्फ जनाजे उठाए जाते हैं - भगत सिंह।


शहीद-ए-आजम भगत सिंह का जन्म २८ सितंबर, १९०७,शनिवार सुबह ९ बजे लायलपुर ज़िले के बंगा गाँव (चक नम्बर १०५ जो अब पाकिस्तान में है) में हुआ था। हालांकि उनका पैतृक निवास आज भी भारतीय पंजाब के नवाँशहर ज़िले के खटकड़कलाँ गाँव में स्थित है। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था। यह एक सिख परिवार था जिसने आर्य समाज के विचार को अपना लिया था। अमृतसर में १३ अप्रैल, १९१९ को हुए जलियाँवाला बाग हत्याकांड ने भगत सिंह की सोच पर गहरा प्रभाव डाला था। लाहौर के नेशनल कॉलेज़ की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन ऐसोसिएशन नाम के एक क्रान्तिकारी संगठन से जुड़ गए थे। भगत सिंह ने भारत की आज़ादी के लिए नौजवान भारत सभा की स्थापना की थी। इस संगठन का उद्देश्य ‘सेवा,त्याग और पीड़ा झेल सकने वाले’ नवयुवक तैयार करना था। भगत सिंह ने राजगुरु के साथ मिलकर १७ दिसम्बर १९२८ को लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक रहे अंग्रेज़ अधिकारी जे०पी० सांडर्स को मारा था। इस कार्रवाई में क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद ने भी उनकी सहायता की थी। क्रान्तिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर भगत सिंह ने अलीपुर रोड पर स्थित दिल्ली की तत्कालीन सेण्ट्रल एसेम्बली के सभागार में ८ अप्रैल १९२९ को 'अंग्रेज़ सरकार को जगाने के लिये' बम और पर्चे फेंके थे। बम फेंकने के बाद वहीं पर दोनों ने अपनी गिरफ्तारी भी दी।

उस समय भगत सिंह करीब १२ वर्ष के थे जब जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड हुआ था। इसकी सूचना मिलते ही भगत सिंह अपने स्कूल से १२ मील पैदल चलकर जलियाँवाला बाग पहुँच गए। इस उम्र में भगत सिंह अपने चाचाओं की क्रान्तिकारी किताबें पढ़ कर सोचते थे कि इनका रास्ता सही है कि नहीं ? गान्धीजी के असहयोग आन्दोलन छिड़ने के बाद वे गान्धीजी के तरीकों और हिंसक आन्दोलन में से अपने लिए रास्ता चुनने लगे। गान्धीजी के असहयोग आन्दोलन को रद्द कर देने कि वजह से उनमें एक रोष (क्रोध) ने जन्म लिया और अन्ततः उन्होंने 'इंकलाब और देश की स्वतन्त्रता के लिए हिंसा' अपनाना अनुचित नहीं समझा। उन्होंने जुलूसों में भाग लेना शुरू किया तथा कई क्रान्तिकारी दलों के सदस्य बने। बाद मे वे अपने दल के प्रमुख क्रान्तिकारियों के प्रतिनिधि बने। उनके दल के प्रमुख क्रान्तिकारियों में चन्द्रशेखर आजाद, भगवतीचरण व्होरा, सुखदेव, राजगुरु इत्यादि थे।

१९२८ में साइमन कमीशन के बहिष्कार के लिये भयानक प्रदर्शन हुए। इन प्रदर्शनों मे भाग लेने वालों पर अंग्रेजी शासन ने लाठी चार्ज भी किया। इसी लाठी चार्ज से आहत होकर लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गई। अब इनसे रहा न गया। एक गुप्त योजना के तहत इन्होंने पुलिस सुपरिंटेंडेंट सॉण्डर्स को मारने की सोची। सोची गई योजना के अनुसार भगत सिंह और राजगुरु सॉण्डर्स कोतवाली के सामने व्यस्त मुद्रा में टहलने लगे। उधर बटुकेश्वर दत्त अपनी साइकिल को लेकर ऐसे बैठ गये जैसे कि वो ख़राब हो गई हो । दत्त के इशारे पर दोनों सचेत हो गए। उधर चन्द्रशेखर आज़ाद पास के डी०ए०वी० स्कूल की चहारदीवारी के पास छिपे इनके घटना के अंजाम देने में रक्षक का काम कर रहे थे। सॉण्डर्स के आते ही राजगुरु ने एक गोली सीधी उसके सर में मारी जिसके तुरन्त बाद वह होश खो बैठा। इसके बाद भगत सिंह ने ३-४ गोली दाग कर उसके मरने का पूरा इन्तज़ाम कर दिया। ये दोनों जैसे ही भाग रहे थे कि एक सिपाही चानन सिंह ने इनका पीछा करना शुरू कर दिया। चन्द्रशेखर आज़ाद ने उसे सावधान किया -"आगे बढ़े तो गोली मार दूँगा।" नहीं मानने पर आज़ाद ने उसे गोली मार दी। इस तरह इन लोगों ने लाला लाजपत राय की मौत का बदला ले लिया ।

भगत सिंह मूलतः खूनखराबे के पक्षधर नहीं थे। पर वे कार्ल मार्क्स के सिद्धान्तों से प्रभावित अवश्य थे। यही नहीं, वे समाजवाद के पक्के पक्षधर भी थे। इसी कारण से उन्हें पूंजीपतियों की मजदूरों के प्रति शोषण की नीति पसन्द नहीं आती थी। उस समय चूँकि अंग्रेज ही सर्वेसर्वा थे तथा बहुत कम भारतीय उद्योगपति तरक्की कर पाये थे, अतः अंग्रेजों के मजदूरों के प्रति रुख़ से उनका ख़फ़ा होना लाज़िमी था। ऐसी नीतियों के पारित होने को निशाना बनाना उनके दल का निर्णय था। सभी चाहते थे कि अंग्रेजों को पता चले कि हिन्दुस्तानी जाग चुके हैं और उनके हृदय में ऐसी नीतियों के खिलाफ़ क्षोभ है। ऐसा करने के लिये उन लोगों ने दिल्ली की केन्द्रीय एसेम्बली में बम फेंकने की सोची।
भगत सिंह चाहते थे कि इसमें कोई खून खराबा न हो तथा अंग्रेजो तक उनकी 'आवाज़' भी पहुँचे। हालांकि उनके दल के सब लोग ऐसा नहीं सोचते थे पर अन्त में सर्वसम्मति से भगत सिंह तथा बटुकेश्वर दत्त का नाम चुना गया। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार ८ अप्रैल, १९२९ को केन्द्रीय असेम्बली में इन दोनों ने एक ऐसे स्थान पर बम फेंका जहाँ कोई मौजूद न था,अन्यथा उसे चोट लग सकती थी। पूरा हॉल धुएँ से भर गया। वे चाहते तो भाग भी सकते थे पर उन्होंने पहले ही सोच रखा था कि उन्हें फ़ाँसी कबूल है अतः उन्होंने भागने से मना कर दिया। उस समय वे दोनों खाकी कमीज़ तथा निकर पहने थे। बम फटने के बाद उन्होंने इंकलाब-जिन्दाबाद का नारा लगाया और अपने साथ लाये हुए पर्चे हवा में उछाल दिये। इसके कुछ ही देर बाद पुलिस आ गयी और दोनों को ग़िरफ़्तार कर लिया गया।

जेल में भगत सिंह ने करीब २ साल गुजारे। इस दौरान वे कई क्रान्तिकारी गतिविधियों से जुड़े रहे। उनका अध्ययन भी जारी रहा। उनके उस दौरान लिखे गये ख़त आज भी उनके विचारों के दर्पण हैं। इस दौरान उन्होंने कई तरह से पूँजीपतियों को अपना शत्रु बताया है। उन्होंने लिखा कि मजदूरों का शोषण करने वाला एक भारतीय ही क्यों न हो, वह उनका शत्रु है। उन्होंने जेल में अंग्रेज़ी में एक लेख भी लिखा जिसका शीर्षक था मैं नास्तिक क्यों हूँ?" जेल में भगत सिंह व उनके साथियों ने ६४ दिनों तक भूख हडताल की। उनके एक साथी यतीन्द्रनाथ दास ने तो भूख हड़ताल में अपने प्राण ही दे दिये ।

२३ मार्च १९३१ को शाम में करीब ७ बजकर ३३ मिनट पर भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फाँसी दे दी गई । फाँसी पर जाने से पहले वे लेनिन की नहीं बल्कि राम प्रसाद 'बिस्मिल' की जीवनी पढ़ रहे थे जो सिन्ध (वर्तमान पाकिस्तान का एक सूबा) के एक प्रकाशक भजन लाल बुकसेलर ने आर्ट प्रेस, सिन्ध से छापी थी। कहा जाता है कि जेल के अधिकारियों ने जब उन्हें यह सूचना दी कि उनके फाँसी का वक्त आ गया है तो उन्होंने कहा था- "ठहरिये! पहले एक क्रान्तिकारी दूसरे से मिल तो ले।" फिर एक मिनट बाद किताब छत की ओर उछाल कर बोले - "ठीक है अब चलो ।"
फाँसी पर जाते समय वे तीनों मस्ती से गा रहे थे -
मेरा रँग दे बसन्ती चोला, मेरा रँग दे;
मेरा रँग दे बसन्ती चोला। माय रँग दे बसन्ती चोला।।
फाँसी के बाद कहीं कोई आन्दोलन न भड़क जाए इसके डर से अंग्रेजों ने पहले इनके मृत शरीर के टुकड़े किए तथा फिर इसे बोरियों में भर कर फ़िरोजपुर की ओर ले गए जहाँ घी के बदले मिट्टी का तेल डालकर ही इनको जलाया जाने लगा । गाँव के लोगों ने आग जलती देखी तो करीब आए । इससे डरकर अंग्रेजों ने इनकी लाश के अधजले टुकड़ों कोसतलुज नदी में फेंका और भाग गये। जब गाँव वाले पास आये तब उन्होंने इनके मृत शरीर के टुकड़ो कों एकत्रित कर विधिवत दाह संस्कार किया । और भगत सिंह हमेशा के लिये अमर हो गये। इसके बाद लोग अंग्रेजों के साथ-साथ गान्धी को भी इनकी मौत का जिम्मेवार समझने लगे । इस कारण जब गान्धी कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में हिस्सा लेने जा रहे थे तो लोगों ने काले झण्डों के साथ गान्धीजी का स्वागत किया । एकाध जग़ह पर गान्धी पर हमला भी हुआ किन्तु सादी वर्दी में उनके साथ चल रही पुलिस ने बचा लिया। बाद में गान्धी को अपनी यात्रा छुपकर करनी पड़ी ।

जेल के दिनों में उनके लिखे खतों व लेखों से उनके विचारों का अन्दाजा लगता है । उन्होंने भारतीय समाज में लिपि (पंजाबी की गुरुमुखी व शाहमुखी तथा हिन्दी और अरबीउर्दू के सन्दर्भ में विशेष रूप से), जाति और धर्म के कारण आयी दूरी पर दुःख व्यक्त किया था । उन्होंने समाज के कमजोर वर्ग पर किसी भारतीय के प्रहार को भी उसी सख्ती से सोचा जितना कि किसी अंग्रेज के द्वारा किए गये अत्याचार को ।
भगत सिंह को हिन्दी, उर्दू, पंजाबी तथा अंग्रेजी के अलावा बांग्ला भी आती थी जो उन्होंने बटुकेश्वर दत्त से सीखी थी । उनका विश्वास था कि उनकी शहादत से भारतीय जनता और उद्विग्न हो जायेगी और ऐसा उनके जिन्दा रहने से शायद ही हो पाये । इसी कारण उन्होंने मौत की सजा सुनाने के बाद भी माफ़ीनामालिखने से साफ मना कर दिया । पं० रामप्रसाद 'बिस्मिल' ने अपनी आत्मकथा में जो-जो दिशा-निर्देश दिये थे उनका भगत सिंह ने अक्षरश: पालन किया।[1]उन्होंने अंग्रेज सरकार को एक पत्र भी लिखा, जिसमें कहा गया था कि उन्हें अंग्रेज़ी सरकार के ख़िलाफ़ भारतीयों के युद्ध का प्रतीक एक युद्धबन्दी समझा जाए तथा फ़ाँसी देने के बदले गोली से उड़ा दिया जाये ।
फ़ाँसी के पहले ३ मार्च को अपने भाई कुलतार को भेजे एक पत्र में भगत सिंह ने लिखा था -
उन्हें यह फ़िक्र है हरदम नयी तर्ज़-ए-ज़फ़ा क्या है
हमें यह शौक है देखें, सितम की इन्तहा क्या है
दहर से क्यों ख़फ़ा रहें,चर्ख से क्यों ग़िला करें
सारा जहाँ अदू सही,आओ! मुक़ाबला करें ।
इन जोशीली पंक्तियों से उनके शौर्य का अनुमान लगाया जा सकता है। शहीद भगत सिंह सदा ही शेर की तरह जिए। चन्द्रशेखर आजा़द से पहली मुलाकात के समय जलती हुई मोमबती पर हाथ रखकर उन्होंने कसम खायी थी कि उनकी जिन्दगी देश पर ही कुर्बान होगी और उन्होंने अपनी वह कसम पूरी कर दिखायी।

उनकी मृत्यु की ख़बर को लाहौर के दैनिक ट्रिब्यून तथा न्यूयॉर्क के एक पत्र डेली वर्कर ने छापा । इसके बाद भी कई मार्क्सवादी पत्रों में उन पर लेख छपे, पर चूँकि भारत में उन दिनों मार्क्सवादी पत्रों के आने पर प्रतिबन्ध लगा था इसलिये भारतीय बुद्धिजीवियों को इसकी ख़बर नहीं थी । देशभर में उनकी शहादत को याद किया गया।
दक्षिण भारत में पेरियार ने उनके लेख 'मैं नास्तिक क्यों हूँ?" पर अपने साप्ताहिक पत्र कुडई आरसू के २२-२९ मार्च, १९३१ के अंक में तमिल में सम्पादकीय लिखा । इसमें भगतसिंह की प्रशंसा की गई थी तथा उनकी शहादत को गान्धीवाद के उपर विजय के रूप में देखा गया था।
आज भी भारत की जनता भगत सिंह को आज़ादी के दीवाने के रूप में देखती है जिसने अपनी जवानी सहित सारी जिन्दगी देश के लिये समर्पित कर दी।

कश्मीर और पं. नेहरू की पांच अक्षम्य भूलें


कश्मीर और पं. नेहरू की पांच अक्षम्य भूलें


वह सर्वविदित है कि पं. नेहरू तथा माउन्टबेटन के परस्पर विशेष सम्बंध थे, जो किसी भी भारतीय कांग्रेसी या मुस्लिम नेता के आपस में न थे। पंडित नेहरू के प्रयासों से ही माउन्टबेटन को स्वतंत्र भारत का पहला गर्वनर जनरल बनाया गया, जबकि जिन्ना ने माउन्टबेटन को पाकिस्तान का पहला गर्वनर जनरल मानने से साफ इन्कार कर दिया, जिसका माउन्टेबटन को जीवन भर अफसोस भी रहा। माउन्टबेटन 24 मार्च, 1947 से 30 जून, 1948 तक भारत में रहे। इन पन्द्रह महीनों में वह न केवल संवैधानिक प्रमुख रहे बल्कि भारत की महत्वपूर्ण नीतियों का निर्णायक भी रहे। पं. नेहरू उन्हें सदैव अपना मित्र, मार्गदर्शक तथा महानतम सलाहकार मानते रहे। वह भी पं. नेहरू को एक "शानदार", "सर्वदा विश्वसनीय" "कल्पनाशील" तथा "सैद्धांतिक समाजवादी" मानते रहे।
कश्मीर के प्रश्न पर भी माउन्टबेटन के विचारों को पं. नेहरू ने अत्यधिक महत्व दिया। पं. नेहरू के शेख अब्दुल्ला के साथ भी गहरे सम्बंध थे। शेख अब्दुल्ला ने 1932 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से एम.एस.सी किया था। फिर वह श्रीनगर के एक हाईस्कूल में अध्यापक नियुक्त हुए, परन्तु अनुशासनहीनता के कारण स्कूल से हटा दिये गये। फिर वह कुछ समय तक ब्रिटिश सरकार से तालमेल बिठाने का प्रयत्न करते रहे। आखिर में उन्होंने 1932 में ही कश्मीर की राजनीति में अपना भाग्य आजमाना चाहा और "मुस्लिम कांफ्रेंस" स्थापित की, जो केवल मुसलमानों के लिए थी। परन्तु 1939 में इसके द्वार अन्य पंथों, मजहबों के मानने वालों के लिए भी खोल दिए गए और इसका नाम "नेशनल कांफ्रेंस" रख दिया तथा इसने पंडित नेहरू के प्रजा मण्डल आन्दोलन से अपने को जोड़ लिया। शेख अब्दुल्ला ने 1940 में नेशनल कांफ्रेंस के सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में पंडित नेहरू को बुलाया था। शेख अब्दुल्ला से पं. नेहरू की अंधी दोस्ती और भी गहरी होती गई। शेख अब्दुल्ला समय-समय पर अपनी शब्दावली बदलते रहे और पं. नेहरू को भी धोखा देते रहे। बाद में भी नेहरू परिवार के साथ शेख अब्दुल्ला के परिवार की यही दोस्ती चलती रही। श्रीमती इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और अब राहुल गांधी की दोस्ती क्रमश: शेख अब्दुल्ला, फारुख अब्दुल्ला तथा वर्तमान में उमर अब्दुल्ला से चल रही है।
महाराजा से कटु सम्बंध दुर्भाग्य से कश्मीर के महाराजा हरि सिंह (1925-1947) से न ही शेख अब्दुल्ला के और न ही पंडित नेहरू के सम्बंध अच्छे रह पाए। महाराजा कश्मीर शेख अब्दुल्ला की कुटिल चालों, स्वार्थी और अलगाववादी सोच तथा कश्मीर में हिन्दू-विरोधी रवैये से परिचित थे। वे इससे भी परिचित थे कि "क्विट कश्मीर आन्दोलन" के द्वारा शेख अब्दुल्ला महाराजा को हटाकर, स्वयं शासन संभालने को आतुर है। जबकि पं. नेहरू भारत के अंतरिम प्रधानमंत्री बन गए थे, तब एक घटना ने इस कटुता को और बढ़ा दिया था। शेख अब्दुल्ला ने श्रीनगर की एक कांफ्रेंस में पंडित नेहरू को आने का निमंत्रण दिया था। इस कांफ्रेंस में मुख्य प्रस्ताव था महाराजा कश्मीर को हटाने का। मजबूर होकर महाराजा ने पं. नेहरू से इस कांफ्रेंस में न आने को कहा। पर न मानने पर पं. नेहरू को जम्मू में ही श्रीनगर जाने से पूर्व रोक दिया गया। पं. नेहरू ने इसे अपना अपमान समझा तथा वे इसे जीवन भर न भूले। इस घटना से शेख अब्दुल्ला को दोहरी प्रसन्नता हुई। इससे वह पं. नेहरू को प्रसन्न करने तथा महाराजा को कुपित करने में सफल हुआ।
कश्मीरियत की भावना पं. नेहरू का व्यक्तित्व यद्यपि राष्ट्रीय था परन्तु कश्मीर का प्रश्न आते ही वे भावुक हो जाते थे। इसीलिए जहां उन्होंने भारत में चौतरफा बिखरी 560 रियासतों के विलय का महान दायित्व सरदार पटेल को सौंपा, वहीं केवल कश्मीरी दस्तावेजों को अपने कब्जे में रखा। ऐसे कई उदाहरण हैं जब वे कश्मीर के मामले में केन्द्रीय प्रशासन की भी सलाह सुनने को तैयार न होते थे तत्कालीन विदेश सचिव वाई.डी. गुणडेवीय का कथन था, "आप प्रधानमंत्री से कश्मीर पर बात न करें। कश्मीर का नाम सुनते ही वे अचेत हो जाते हैं।" प्रस्तुत लेख के लेखक का स्वयं का भी एक अनुभव है-1958 में मैं एक प्रतिनिधिमण्डल के साथ पं. नेहरू के निवास तीन मूर्ति गया। वहां स्कूल के बच्चों ने उनके सामने कश्मीर पर पाकिस्तान को चुनौती देते हुए एक गीत प्रस्तुत किया। इसमें "कश्मीर भला तू क्या लेगा?" सुनते ही पं. नेहरू तिलमिला गए तथा गीत को बीच में ही बन्द करने को कहा।
महाराजा की भारत-प्रियता जिन्ना कश्मीर तथा हैदराबाद पर पाकिस्तान का आधिपत्य चाहते थे। उन्होंने अपने सैन्य सचिव को तीन बार महाराजा कश्मीर से मिलने के लिए भेजा। तत्कालीन कश्मीर के प्रधानमंत्री काक ने भी उनसे मिलाने का वायदा किया था। पर महाराजा ने बार-बार बीमारी का बहाना बनाकर बातचीत को टाल दिया। जिन्ना ने गर्मियों की छुट्टी कश्मीर में बिताने की इजाजत चाही थी। परन्तु महाराजा ने विनमर्तापूर्वक इस आग्रह को टालते हुए कहा था कि वह एक पड़ोसी देश के गर्वनर जनरल को ठहराने की औपचारिकता पूरी नहीं कर पाएंगे। दूसरी ओर शेख अब्दुल्ला गद्दी हथियाने तथा इसे एक मुस्लिम प्रदेश (देश) बनाने को आतुर थे। पं. नेहरू भी अपमानित महसूस कर रहे थे। उधर माउंटबेटन भी जून मास में तीन दिन कश्मीर रहे थे। शायद वे कश्मीर का विलय पाकिस्तान में चाहते थे, क्योंकि उन्होंने मेहरचन्द महाजन से कहा था कि "भौगोलिक स्थिति" को देखते हुए कश्मीर के पाकिस्तान का भाग बनना उचित है। इस समस्त प्रसंग में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका श्री गुरुजी (माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर) ने निभाई। वे महाराजा कश्मीर से बातचीत करने 18 अक्तूबर को श्रीनगर पहुंचे। विचार-विमर्श के पश्चात महाराजा कश्मीर अपनी रियासत के भारत में विलय के लिए पूरी तरह पक्ष में हो गए थे।

पं. नेहरू की भयंकर भूलें 
जब षड्यंत्रों से बात नहीं बनी तो पाकिस्तान ने बल प्रयोग द्वारा कश्मीर को हथियाने की कोशिश की तथा 22 अक्तूबर, 1947 को सेना के साथ कबाइलियों ने मुजफ्फराबाद की ओर कूच किया। लेकिन कश्मीर के नए प्रधानमंत्री मेहरचन्द्र महाजन के बार-बार सहायता के अनुरोध पर भी भारत सरकार उदासीन रही। भारत सरकार के गुप्तचर विभाग ने भी इस सन्दर्भ में कोई पूर्व जानकारी नहीं दी। कश्मीर के ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह ने बिना वर्दी के 250 जवानों के साथ पाकिस्तान की सेना को रोकने की कोशिश की तथा वे सभी वीरगति को प्राप्त हुए। आखिर 24 अक्तूबर को माउन्टबेटन ने "सुरक्षा कमेटी" की बैठक की। परन्तु बैठक में महाराजा को किसी भी प्रकार की सहायता देने का निर्णय नहीं किया गया। 26 अक्तूबर को पुन: कमेटी की बैठक हुई। अध्यक्ष माउन्टबेटन अब भी महाराजा के हस्ताक्षर सहित विलय प्राप्त न होने तक किसी सहायता के पक्ष में नहीं थे। आखिरकार 26 अक्तूबर को सरदार पटेल ने अपने सचिव वी.पी. मेनन को महाराजा के हस्ताक्षर युक्त विलय दस्तावेज लाने को कहा। सरदार पटेल स्वयं वापसी में वी.पी. मेनन से मिलने हवाई अड्डे पहुंचे। विलय पत्र मिलने के बाद 27 अक्तूबर को हवाई जहाज द्वारा श्रीनगर में भारतीय सेना भेजी गई।
दूसरे, जब भारत की विजय-वाहिनी सेनाएं कबाइलियों को खदेड़ रही थीं। सात नवम्बर को बारहमूला कबाइलियों से खाली करा लिया गया था परन्तु पं. नेहरू ने शेख अब्दुल्ला की सलाह पर तुरन्त युद्ध विराम कर दिया। परिणामस्वरूप कश्मीर का एक तिहाई भाग जिसमें मुजफ्फराबाद, पुंछ, मीरपुर, गिलागित आदि क्षेत्र आते हैं, पाकिस्तान के पास रह गए, जो आज भी "आजाद कश्मीर" के नाम से पुकारे जाते हैं।
तीसरे, माउन्टबेटन की सलाह पर पं. नेहरू एक जनवरी, 1948 को कश्मीर का मामला संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् में ले गए। सम्भवत: इसके द्वारा वे विश्व के सामने अपनी ईमानदारी छवि का प्रदर्शन करना चाहते थे तथा विश्वव्यापी प्रतिष्ठा प्राप्त करना चाहते थे। पर यह प्रश्न विश्व पंचायत में युद्ध का मुद्दा बन गया।
चौथी भयंकर भूल पं. नेहरू ने तब की जबकि देश के अनेक नेताओं के विरोध के बाद भी, शेख अब्दुल्ला की सलाह पर भारतीय संविधान में धारा 370 जुड़ गई। न्यायाधीश डी.डी. बसु ने इस धारा को असंवैधानिक तथा राजनीति से प्रेरित बतलाया। डा. भीमराव अम्बेडकर ने इसका विरोध किया तथा स्वयं इस धारा को जोड़ने से मना कर दिया। इस पर प्रधानमंत्री पं. नेहरू ने रियासत राज्यमंत्री गोपाल स्वामी आयंगर द्वारा 17 अक्तूबर, 1949 को यह प्रस्ताव रखवाया। इसमें कश्मीर के लिए अलग संविधान को स्वीकृति दी गई जिसमें भारत का कोई भी कानून यहां की विधानसभा द्वारा पारित होने तक लागू नहीं होगा। दूसरे शब्दों में दो संविधान, दो प्रधान तथा दो निशान को मान्यता दी गई। कश्मीर जाने के लिए परमिट की अनिवार्यता की गई। शेख अब्दुल्ला कश्मीर के प्रधानमंत्री बने। वस्तुत: इस धारा के जोड़ने से बढ़कर दूसरी कोई भयंकर गलती हो नहीं सकती थी।
पांचवीं भयंकर भूल शेख अब्दुल्ला को कश्मीर का "प्रधानमंत्री" बनाकर की। उसी काल में देश के महान राजनेता डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने दो विधान,, दो प्रधान, दो निशान के विरुद्ध देशव्यापी आन्दोलन किया। वे परमिट व्यवस्था को तोड़कर श्रीनगर गए जहां जेल में उनकी हत्या कर दी गई। पं. नेहरू को अपनी गलती का अहसास हुआ, पर बहुत देर से। शेख अब्दुल्ला को कारागार में डाल दिया गया लेकिन पं. नेहरू ने अपनी मृत्यु से पूर्व अप्रैल, 1964 में उन्हें पुन: रिहा कर दिया। पं. नेहरू की इन पांच ऐतिहासिक भूलों का मूल्य तो भारत की वर्तमान पीढ़ी को चुकाना पड़ ही रहा है, अब नेहरू परिवार द्वारा की जा रही भयंकर भूलों का मूल्य भावी पीढ़ी चुकाएगी।

भगत सिहं क़ी आख़िरी इच्छा जो आजतक पुरी नहीं हुई





भगत सिहं क़ी आख़िरी इच्छा जो आजतक पुरी नहीं हुई । 1857 से पहले भारत में अंग्रेजो की पुलिस नहीं थी ।सेना हुआ करती थे | और अगर आप लोगो को पता हो 10 मई 1857 को भारत में क्रांति हो गई थी. उस समय के जो महान क्रन्तिकारी थे , उनका नाम था. नाना साहब,तात्याँ टोपे, मंगल पांडे आदि. इन्होने 7 लाख 32 हजार युवको की फ़ौज बनाई थी | और 10 मई 1857 को क्रांति करने का दिन चुना | उन्होंने 1 ही दिन में 2.लाख 50 हजार अंग्रेजो को काट डाला अंग्रेज भाग खड़े हुए | उसके लगभग 1 साल बाद अंग्रेजो ने भारत के कुछ गद्दार राजाओ के साथ मिल फ़िर से वपिस आने की योजना बनाई. जिसमे (कैपट्न अमरिंद्र सिहं ज़ो पंजाब के कांग्रेस की सीट पर मुख्य मत्रीं का चुनाव लड़्ते है जो काफ़ी बार मुख्य मत्रीं भी रह चुके हैं.) उसके दादा पटियाला के नवाब के साथ मिल कर 1857 के क्रंतिकरियो का क़त्ल करवाया और दुबारा भारत में अंग्रेजों को घुसाया गया ! अंग्रेजो ने दुबारा जब भारत में प्रवेश किया तो सोचा की कही दुबारा क्रांति ना हो जाये. इसके लिए उन्होने इंडियन पुलिस एक्ट INDIAN POLICE ACT और हम पर अत्याचार करने के लिए 34735 चौंतीस हज़ार सात सो पेंतीस कानून बनाये गए जिसमे की पुलिस के हाथ में लाठी और डंडे हथियार सौंप दिए गए और ये सभी अधिकार उन्हें मिल गए, की के अंग्रेजो की पुलिस क्रांतिकारियों पर जितने चाहे मर्जी डडें मारे. लठियो से पिटे कोई कुछ नहीं कर सकता और अगर किसी क्रन्तिकारी ने अपने बचाव के लिये उसकी लाठी पकड़्ने की कोशिश मात्र भी की तो क्रांतिकारियों पर मुकदमा चलेगा | बात उस समय की है की जब इन कानूनों को बढ़ावा देने के लिए SIMON COMMISSION भारत आ रहा था और उसका बहिष्कार करने के लिए क्रन्तिकारी लाला लाजपत राय जी आन्दोलन कर रहे थे वो शांतिपूर्वक तरीके से आन्दोलन कर रहे थे तभी एक अंग्रेज अधिकारी जिसका नाम J.P. Saunders जे.पी. सॉन्डर्स था उसने लाला जी पर लाठियां बरसानी शुरू कर दी और जानबूझकर उसने लाला जी के सर पे लाठियां मारी 1 लाठी मारी 2 मारी 3 मारी 4 मारी 5 , 10 ऐसे करते करते उस दुष्ट ने लाला जी पर 14 लाठियां मारी खून बहने लगा ! और उनकी मृत्यु हो गई ! अब कानून के हिसाब से सॉन्डर्स क़ो सज़ा मिलनी चाहिए इसके लिये भगत सिहं ने पुलिस में शिकायत दर्ज की. मामला अदालत तक गया वहां भगत सिहं ने सफ़ाई दी | लाठिया कमर के नीचे तक मारी जा सकती लेकिन लाला जी के सर पर लाठियां क्यों मारी गयी | जिससे उनकी मौत हुई, अदालात ने उनका तर्क नहीं माना और अदालत ने कहा सॉन्डर्स ने जो किया वो तो कानून में हैं ! उसने कोई कानून नहीं तोड़ा. इसलिये उसको बरी किया जाता है और सॉन्डर्स बरी हो गया भगत सिहं को गुस्सा आया | उसने कहा जिस अंग्रेजी न्याय व्यवस्था ने लाला जी को इन्साफ़ नहीं दिया | और सॉन्डर्स को छोड़ दिया | उसको सज़ा मैं दूंगा और सॉन्डर्स को वहीं पहुंचाउंगा जहाँ इसने लाला जी को पहुँचाया है | और भगत सिहं ने सॉन्डर्स को गोली से उड़ा दिया | जब भगत सिहं को फ़ासीं होने वाली थी तो उससे कुछ दिन पहले वो लाहौर की जेल में बंद थे | तब कुछ पत्रकार उनसे मिलने जाया करते थे | तब एक पत्रकार ने भगत सिहं से पुछा आपका देश के युवको के नाम संदेश | तब भगत सिहं कहा की मैं तो फ़ासीं चढ़ रहा हूँ | लीकेन देश के नोजवानो को कहना चाहता हूँ | जिस इंडियन पुलिस एक्ट INDIAN POLICE ACT अंग्रेजों द्वारा बनाये गए कानून के कारण लाला जी हत्या हुई | और जिसके कारण मैं फ़ासीं चढ़ रहा हूँ., देश नोजावानो को कहना चाहता हूँ. कि आजादी मिलने से पहले पहले किसी भी हालत में इस इंडियन पुलिस एक्ट INDIAN POLICE ACT को खत्म करवा देना | यही मेरी दिली इच्छा हैं | मेरे देश के प्रति मेरी भावना हैं| लेकिन आज तक वोही कानून आज तक चल रहे हैं कितने शर्म की बात है. आजादी के 64 साल बाद भी इस इंडियन पुलिस एक्ट INDIAN POLICE ACT को खत्म नहीं किया गया | आज भी आप अकसर सुनंते हो पुलिस ने लाठी चार्ज किया | कभी किसाने के उपर जो अपनी जमीन माँग रहे होते हैं| कभी ग़रीब लोगो के उपर जो अपना हक़ मांग रहे हैं | सबसे ताजी घटना तो 4 जून 2011 की काली रात है जहाँ बड़े ही शांतिप्रिय तरीके से स्वामी रामदेव जी विदेशों में जमा काले धन को देश में वापस लाने के लिए और इस भ्रष्ट व्यवस्था में परिवर्तन लाने के लिए अपने सहयोगियों के साथ आन्दोलन कर रहे थे | और बड़े शर्म की बात है की दिल्ली पुलिस ने रात के लगभग 1 बजे सोते हुए मासूम लोगों पर बच्चों पर महिलाओं पर साधुसंतों पर लाठियां बरसानी शुरू कर दी पता नहीं कितने लोगो के हड्डियाँ टुटी और घायल हो गये | इसी घटना में बहन राजबाला जी पुलिस की इस बर्बरता की शिकार हो गई और पुलिस ने उनपर जम कर लाठियां बरसाईं 26 सितम्बर 2011 सोमवार को उनका देहांत हो गया पुलिस की लाठियों का शिकार होकर बहन राजबाला वेंटिलेटर पर थी और उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए क्या यही है हमारा कानून क्या यही न्याय है ! क्यों ऐसा हुआ 04 जून को ये सब इसलिए हुआ की आज भी अंग्रेजों द्वारा बनाये गए कानून का इस्तेमाल ये काले अंग्रेज मासूम लोगों पर कर रहे हैं और आज भी इनके हाथों में लाठियां हैं क्योंकि आज भी 1860 में बनाया गया इंडियन पुलिस एक्ट INDIAN POLICE एक्ट आज वैसा का वैसा ही इस देश में चल रहा है ! और ये काले अंग्रेज हम पर अन्याय कर रहे हैं ! और यह केवल 1 कानून नहीं ऐसे पुरे के पुरे 34735 चौंतीस हज़ार सात सो पेंतीस अंग्रेजों के कानून जो अंग्रेजो ने भारत को गुलाम बनाने के लिये बानाये थे| आज भी वैसा ही चल रहा है | भगत सिहं की आखरी इच्छा आज तक पूरी नहीं हुई | पता नहीं हर साल हम किस मुहं से उसका जन्म दिवस मनाते हैं| पता नहीं किस मुहं से 23 मार्च को उसको श्रध्दाजलि अर्पित करते हैं| जिस क्रूर अंग्रेजों द्वारा बनाये गए कानून के कारण लाला जी की जान गयी| जिस कानून के कारन भगत सिहं फांसी पर चढ्या गया | और आजादी के 64 साल बाद भी हम उस कानून को मिटा नहीं पाये |

Monday, December 5, 2011

क्या आज के मुसलमानों को अल्लाह पर विश्वास नहीं हैं जो वे अपने बेटो की क़ुरबानी नहीं देते बल्कि एक निरपराध पशु के कत्ल के गुनहगार बनते हैं?

क्या आज के मुसलमानों को अल्लाह पर विश्वास नहीं हैं जो वे अपने बेटो की क़ुरबानी नहीं देते बल्कि एक निरपराध पशु के कत्ल के गुनहगार बनते हैं?

यह संभव ही नहीं हैं क्योंकि जो अल्लाह या भगवान प्राणियों की रक्षा करता हैं वह किसी के सपने में आकर उन्हें मारने की प्रेरणा देगा . मुसलमान लोगो की बुद्धि को क्या हो गया हैं अगर हज़रत इब्राहीम को किसी लड़की के साथ बलात्कार करने को अल्लाह कहते तो वे उसे नहीं मानते तो फिर अपने इकलोते लड़के को मारने के लिए कैसे तैयार हो गए.

मुसलमानों को तत्काल इस प्रकार का कत्लेंआम बंद कर देना चाहिए.

मुसलमानों के सबसे पाक किताब कुरान-ए-शरीफ के अल हज २२:३७ में कहा गया हैं न उनके मांस अल्लाह को पहुँचते हैं और न उनके रक्त, किन्तु उसे तुम्हारा तकवा (धर्मप्रयाणता) पहुँचता हैं. यहीं बात अल- अनआम ६: ३८ में भी कहीं गयी हैं. हदीसो में भी इस प्रकार के कई प्रमाण मिलते हैं.

मुसलमानों में सबसे पवित्र समझी जाने वाली मक्का की यात्रा पर किसी भी प्रकार के मांसाहार यहाँ तक की जूं तक को मारने की अनुमति नहीं होती हैं तो फिर अल्लाह के नाम पर इस प्रकार कत्लेआम क्यों होता हैं.

Sunday, December 4, 2011

बंगलादेशी घुसपैठियों को हां , पाकिस्तानी हिन्दुओं को ना

पाकिस्तान से करीब दो सौ हिंदू परिवार वहाँ हो रहे रोज रोज अत्याचारों से तंग आकर भारत मे शरण की मांग कर रहे है ..ये लोग दिल्ली के ‘मजनू का टीला ” मे खुले असमान के नीचे अपना डेरा जमाए है ..लेकिन केंद्र की कांग्रेस सरकार ने उनका आवेदन ठुकराते हुए उन्हें एक सप्ताह के अंदर भारत छोड़ने का हुक्म सुना दिया ..

पाकिस्तान मे तालिबान और वहाँ के स्थानीय गुंडे पाकिस्तानी प्रशासन की सहायता से हिन्दुओ का कत्ल , बलात्कार , अपहरण , जजिया कर , आदि जैसे अत्याचार वहाँ रोज करते है ..पकिस्तान मे हिन्दुओ (सिख समुदाय सहित ) को वोट देने का अधिकार नहीं है और उन्हें वहाँ दूसरे दर्जे की नागरिकता मिली हुयी है .इसलिए ये अपनी आवाज बुलंद भी नहीं कर सकते ..

ये बेचारे ये सोचकर भारत सरकार से शरण की मांग कर रहे थे कि भारत सरकार इनकी भावनाओ की कद्र करेगी .लेकिन इन बेचारोको ये नहीं मालूम था की भारत मे जो कांग्रेस की सरकार है वो हिन्दुओ के लिए तालिबान से भी ज्यादा क्रूर है .नहीं तो रात को दो बजे राजबाला को मीडिया के कैमरे के सामने लाठियो से पीट पीट कर हत्या नहीं की जाती ..उसे १२३ दिन कोमा मे रहने के वावजूद सरकार या कांग्रेस का कोई भी नुमाइंदा उसका हाल चाल लेने तक नही गया ..

लेकिन सवाल ये है कि अगर बांग्लादेश से करोडो मुसलमान भारत आकर बस सकते है तो फिर पाकिस्तान से दो सौ हिंदू क्यों नहीं ?? असल मे कांग्रेस अपना वोटबैक का नफा नुकसान समझकर ही विदेशियो को भारत मे शरण देती है ..कांग्रेस को लगता है कि बंगलादेशी मुसलमान उसके लिए वोट बैंक बन सकते है ..आसाम के चुनावो मे अब बंगलादेशी मुसलमान ही हार और जीत तय करते है ..कांग्रेस को लगता है कि हिंदू उसके लिए वोट बैंक नहीं है .

आप दिल्ली की सीलमपुर , सीमापुरी . मुंबई की धारावी .कोलकाता आदि जगहों के झोपड़पट्टी मे ९०% बंगलादेशी रहते है ..इनलोगों ने स्थानीय कांग्रेसी नेताओ से मिलकर अपना नाम निर्वाचन सूची मे डलवा दिया है और इनको कांग्रेस अपना बड़ा वोट बैंक मानती है ..

भारत के शरण और आव्रजन कानून के मुताबिक भारत हिन्दुओ को शरण देने के लिए बाध्य है--

अंग्रेजो ने भारत से करोडो हिन्दुओ को गन्ने की खेती करने के लिए मारीशस , गुयाना , डच और फ्रेंच गुयाना , सूरीनाम , त्रिनिदाद ,टोबैगो .फिजी , वेस्टइंडीज, बहसूमा, इंडोनेशिया, सेसल्स , और पेसिफिक के कई छोटे छोटे द्वीप पर लेकर गए ..उन्होंने उनके साथ एक एग्रीमेंट किया था कि अगर उनके आने वाली पीढियां भारत मे आकर बसना चाहेगी तो भारत सरकार उनको अपना नागरिक मानकर उन्हें बसाएगी ..फिर बाद मे अंग्रेजो ने दूसरे हर देश के हिंदू और सिक्खो के लिए इस कानून का फैलाव कर दिया …युगांडा मे जब ईदी अमिन के जुल्मो से तंग आकर वहाँ कई पीढियो से बसे लाखो गुजरातियो को इसी कानून के तहत वापस भारत मे बसाया गया ..

आज़ादी के बाद जब सरदार पटेल भारत के गृह मंत्री बने तो उन्होंने इस कानून को और कड़ा कर दिया ..उन्होंने कहा कि भारत सरकार का सिर्फ ये क़ानूनी जबाबदारी नहीं बल्कि ये भारत सरकार की नैतिक जबाबदारी बनती है कि दुनिया के किसी भी देश मे यदि हिन्दुओ और सिखों पर अत्याचार हों तो भारत सरकार इसके खिलाफ पुरजोर आवाज उठाये ..

कांग्रेस की नरसिंहराव सरकार जो कांग्रेस की पहली ऐसी सरकार थी जो गाँधी परिवार की काली और गन्दी छाया से दूर रहकर निर्भीकता से अपना कार्यकाल पूरा किया .और कई क्रान्तिकारी बदलाव इस देश मे किया . इसी सरकार ने सबसे पहले इजरायल को मान्यता देते हुए इजरायल से कूटनीतिक संबंध स्थापित किये …इसी सरकार के समय मे जब फिजी मे महेंद्र चौधरी की सरकार को वहा की सेना ने हटा दिया और हिन्दुओ पर जुल्म करने लगी तो भारत सरकार ने वहाँ से हिन्दुओ को भारत लाने की वयस्था की और उनको भारत मे बसाया गया ..खुद महेद्र चौधरी ने अपना एक घर गुणगांव मे बनवाया ..

लेकिन आज की कांग्रेस सरकार के उपर घोर हिंदू विरोधी मानसिकता हावी है तभी तो कानूनों को ताक पर रख कर विदेश मंत्रायल मे पाकिस्तानी हिन्दुओ और सिक्खो को भारत से जाने का फरमान सुनाया है ..